Wednesday, February 25, 2026

बारिश की वो शाम (एक याद, एक एहसास)

 

🌧 बारिश की वो शाम (एक याद, एक एहसास)

कुछ शामें सिर्फ शाम नहीं होतीं…
वो याद बन जाती हैं।

बारिश की एक ऐसी ही शाम,
जो आज भी दिल में ताज़ा है।


☁️ बादलों की आहट

आसमान में काले बादल छा गए थे।
हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू फैल रही थी।

हम सब छत पर खड़े होकर बादलों को देख रहे थे —
कब पहली बूंद गिरेगी, बस उसी इंतज़ार में।

जैसे ही बारिश शुरू हुई,
दिल भी मुस्कुरा उठा।


👣 बचपन की मस्ती

बारिश का मतलब था:

  • कागज़ की नाव

  • गली में पानी के छींटे

  • माँ की डाँट

  • और दोस्तों की हँसी

हम भीगते थे, गिरते थे, हँसते थे —
और उस पल में जीते थे।

ना मोबाइल था,
ना सोशल मीडिया,
सिर्फ असली खुशियाँ थीं।


☕ माँ की चाय और पकौड़े

जब हम भीगकर घर लौटते,
माँ दरवाज़े पर खड़ी मिलती।

“कितनी बार कहा है, बारिश में मत भीगा करो!”

लेकिन थोड़ी देर बाद वही माँ
गर्म चाय और पकौड़े लेकर बैठ जाती।

उस चाय में जो स्वाद था,
वो आज किसी कैफे में नहीं मिलता।


🌆 आज की सच्चाई

आज भी बारिश होती है…
पर हम खिड़की से देखते हैं।

कपड़ों के भीगने का डर,
मोबाइल खराब होने का डर,
बीमार पड़ने का डर…

और धीरे-धीरे
हमने जीना कम कर दिया।


💭 एक सवाल खुद से

कब आखिरी बार आपने बारिश में भीगकर हँसी महसूस की थी?

कब आखिरी बार बिना किसी चिंता के
बस उस पल को जिया था?

ज़िंदगी बहुत तेज़ हो गई है…
पर खुशियाँ अभी भी छोटी-छोटी चीज़ों में छुपी हैं।


🌈 छोटी सी सीख

हर बारिश में भीगना ज़रूरी नहीं,
पर हर पल को जीना ज़रूरी है।

कभी-कभी:

  • फोन साइड में रख दीजिए

  • चाय बनाइए

  • खिड़की के पास बैठिए

  • और बस बारिश को सुनिए

यकीन मानिए,
मन हल्का हो जाएगा।


✨ अंत में

बारिश सिर्फ मौसम नहीं है।
वो याद है,
वो बचपन है,
वो सुकून है।

अगर यह पढ़कर आपको भी कोई पुरानी याद आई हो,
तो आज उस याद को मुस्कुराकर याद कीजिए।

क्योंकि
ज़िंदगी की असली खूबसूरती यादों में ही बसती है।

Monday, February 23, 2026

माँ की रसोई और बचपन की खुशबू

 

🌸 माँ की रसोई और बचपन की खुशबू

कभी-कभी ज़िंदगी बहुत आगे निकल जाती है…
लेकिन दिल वही रुक जाता है — माँ की रसोई में।

आज की यह कहानी नहीं, एक एहसास है। शायद आपको भी अपने बचपन में ले जाए।


👩‍🍳 माँ की रसोई

जब हम छोटे थे,
रसोई सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं थी।

वो थी —

  • हमारी शिकायतों की अदालत

  • हमारे सपनों का कमरा

  • और प्यार का सबसे बड़ा भंडार

माँ जब आटा गूंथती थी,
तो लगता था जैसे उसमें सिर्फ पानी नहीं,
दुआएँ भी मिला रही हो।

दाल की खुशबू पूरे घर में फैलती थी,
और हम रसोई के दरवाज़े पर खड़े होकर पूछते,
“माँ, खाना कब बनेगा?”


🍲 सादा खाना, गहरी खुशी

ना पिज़्ज़ा था,
ना बर्गर,
ना ऑनलाइन ऑर्डर।

फिर भी:

  • गरम फूली हुई रोटी

  • दाल-चावल

  • आलू की सब्ज़ी

  • और अंत में गुड़

इनसे ज़्यादा स्वादिष्ट कुछ नहीं था।

क्योंकि उसमें माँ का प्यार मिला होता था।


🌆 बड़े होकर क्या खो दिया?

आज हम बड़े हो गए हैं।

ऑफिस, मीटिंग, बिज़नेस, टारगेट…
सब कुछ है।

लेकिन क्या वो सुकून है?

अब खाना ऐप से आता है,
रसोई मॉडर्न हो गई है,
लेकिन वो “माँ” वाली खुशबू नहीं आती।


💭 एक दिन की बात

कुछ दिन पहले घर गया था।
माँ ने पूछा,
“क्या खाएगा?”

मैंने कहा,
“कुछ भी बना लो।”

माँ मुस्कुराई और बोली,
“बचपन में तो तू हर दिन अलग फरमाइश करता था।”

उस दिन समझ आया —
हम बड़े तो हो गए, पर माँ के लिए अब भी बच्चे ही हैं।


🌼 छोटी सी सीख

अगर आपके माता-पिता आपके साथ हैं,
तो यह आपकी सबसे बड़ी दौलत है।

आज:

  • उनके साथ बैठकर खाना खाइए

  • उनकी रसोई की तारीफ़ कीजिए

  • एक बार “धन्यवाद” कहिए

यकीन मानिए,
उनकी आँखों की चमक किसी भी सफलता से बड़ी होती है।


✨ अंत में

ज़िंदगी में बहुत कुछ मिलेगा —
नाम, पैसा, शोहरत…

लेकिन
माँ की रसोई और बचपन की खुशबू — दोबारा नहीं मिलती।

आज अगर यह पढ़कर आपके चेहरे पर मुस्कान आई हो,
तो एक बार माँ को गले ज़रूर लगाइए।

Sunday, February 22, 2026

ज़िंदगी की असली दौलत (एक छोटी सी कहानी)

 

ज़िंदगी की असली दौलत (एक छोटी सी कहानी)

आज की तेज़ भागती दुनिया में हम सब कुछ पाने की दौड़ में लगे हैं — पैसा, नाम, बड़ा घर, बड़ी गाड़ी।
लेकिन क्या कभी रुके हैं यह सोचने के लिए कि असल दौलत क्या है?

यह एक छोटी सी कहानी है, शायद आपके दिल को छू जाए।


👨‍👩‍👦 कहानी – “राघव की समझ”

राघव एक छोटे से गाँव में पला-बढ़ा था। उसके पिता किसान थे और माँ गृहिणी। घर में ज़्यादा पैसे नहीं थे, लेकिन प्यार बहुत था।

हर सुबह उसकी माँ उसे चाय के साथ एक ही बात कहती,
“बेटा, बड़ा आदमी बनना… पर पहले अच्छा इंसान बनना।”

राघव पढ़ाई में होशियार था। उसने शहर जाकर नौकरी की, फिर अपनी कंपनी शुरू की। कुछ ही सालों में वह बहुत अमीर हो गया। बड़ी कार, आलीशान फ्लैट, विदेश यात्राएँ — सब कुछ था उसके पास।

लेकिन धीरे-धीरे वह बदलने लगा।

फोन कम आने लगे…
गाँव जाना कम हो गया…
माँ-बाप से बात करना भी कम हो गया।

उसे लगता था कि वह बहुत व्यस्त है।


📞 एक दिन...

एक दिन ऑफिस में मीटिंग के बीच में उसे गाँव से फोन आया।

उसकी माँ बीमार थी।

राघव तुरंत गाँव पहुँचा। माँ बिस्तर पर थी, पर चेहरे पर वही सुकून।

माँ ने उसका हाथ पकड़कर कहा,
“बेटा, तू बहुत बड़ा आदमी बन गया… पर याद रखना, घर से बड़ा कोई महल नहीं होता।”

उस रात राघव सो नहीं पाया।
उसे एहसास हुआ कि उसने बहुत कुछ कमाया… लेकिन अपनों के साथ बिताया समय खो दिया।


💭 असली दौलत क्या है?

  • माता-पिता का आशीर्वाद

  • परिवार के साथ बिताया समय

  • सच्चे दोस्त

  • मन की शांति

  • और अच्छे कर्म

पैसा ज़रूरी है, लेकिन वह सब कुछ नहीं है।


✨ एक छोटी सी सीख

हम सब अपने सपनों के पीछे भाग रहे हैं।
भागना गलत नहीं है…
पर इतना भी मत भागो कि पीछे मुड़कर देखने का समय ही न मिले।

कभी-कभी माँ की बनाई चाय,
पिता की सलाह,
और घर का सुकून —
किसी भी करोड़ों की डील से ज़्यादा कीमती होता है।


🌸 अंत में…

अगर यह कहानी आपको अच्छी लगी हो, तो आज ही अपने माता-पिता को फोन करें।
सिर्फ दो मिनट… पर दिल से।

क्योंकि ज़िंदगी की असली दौलत बैंक बैलेंस नहीं, रिश्ते होते हैं।

Saturday, March 13, 2010

ફૂલ ઝરંતો હાથ લઈને, ઝાકળ જેવી જાત લઈને

ફૂલ ઝરંતો હાથ લઈને, ઝાકળ જેવી જાત લઈને,
સૂરજની એક વાત લઈને મારે તમને મળવું છે !
સાંજ ઢળ્યા-ની ‘હાશ’ લઈને, ઝલમલતો અજવાસ લઈને,
કોરાં સપના સાત લઈને મારે તમને મળવું છે.
તમે કદાચિત ભૂલી ગયા છો, કદી આપણે કાગળ ઉપર,
ચિતર્યું’તું જળ ખળખળ વહેતું, ને તરતી મૂકી’તી હોડી;
સ્થિર ઊભેલી તે હોડીને તરતી કરવા, સરસર સરવા,
ઝરમર ઝરમર સાદ લઈને મારે તમને મળવું છે.
ખોજ તમારી કરતાં કરતાં થાક્યો છું હું, પાક્યો છું હું,
પગમાંથી પગલું થઈ જઈને વિખરાયો કે વ્યાપ્યો છું હું;
જ્યાં અટવાયો જ્યાં રઘવાયો, તે સઘળા મારગ ને
મારગનો એ સઘળો થાક લઈને મારે તમને મળવું છે.
ક્યારેક તો ‘હું’ને છોડી દો, ભીતરની ભીંતો તોડી દો,
બંધ કમાડ જરા ખોલી દો, એકવાર તો ‘હા’ બોલી દો;
‘હા’ બોલો તો હાથમાં થોડા ચાંદલીયા ને તારલીયાની
ઝગમગતી સોગાત લઈને મારે તમને મળવું છે.
– રિષભ મહેતા

ક્યાં કહું છું કે ફૂલછાબ આપો

ક્યાં કહું છું કે ફૂલછાબ આપો
ફૂલ એક આપો, પણ ગુલાબ આપો.
કાળી રાતો ને જેમ ચંદ્ર મળે
બંધ આંખોને એવું ખ્વાબ મળે.
સ્વપ્ન આંખોએ કેટલાં જોયાં ?
ચાલો, આંસુભીનો હિસાબ આપો.
આંખોઆંખોમાં પ્રશ્ન પૂછ્યો છે
હોઠથી હોઠને જવાબ આપો.
મેં તો મનમાં હતું એ પૂછી લીધું
આપોઆપો, હવે જવાબ આપો.
એટલે તારા મેં નથી તોડ્યા
કાલે કહેશો કે આફતાબ આપો.
એ પૂછે છે જીવન વિશે હેમંત
એને કોરી ખૂલી કિતાબ આપો.

અસલના ઉતારા છે મારી ગઝલમાં

અસલના ઉતારા છે મારી ગઝલમાં,
કે મોઘમ ઇશારા છે મારી ગઝલમાં.
રૂપાળાં તિખારા છે મારી ગઝલમાં,
સળગતા સિતારા છે મારી ગઝલમાં
સહારે સહારા છે મારી ગઝલમાં,
કિનારે કિનારા છે મારી ગઝલમાં.
નથી હોતું ઓસડ કહ્યું કોણે મીઠું ?
ઘણા બોલ પ્યારા છે મારી ગઝલમાં.
નથી દર્શ એનાં થયાં જિંદગીને ,
પ્રસંગો કુંવારા છે મારી ગઝલમાં.
જીવનમાં હલાહલ ભળ્યું છે પરંતુ,
અમીના ફુવારા છે મારી ગઝલમાં.
વિસંવાદ તારો નથી એમાં, દુનિયા !
ફકત ભાઈચારા છે મારી ગઝલમાં.
જગતને કરી દે ગમે ત્યારે જાગૃત ,
કલંદરના નારા છે મારી ગઝલમાં.
રહ્યો છું ભલે ઘૂમી બેહોશ ‘ગાફિલ’,
છૂપા હોશ મારા છે મારી ગઝલમાં.
- મનુભાઈ ત્રિવેદી (‘ગાફિલ’ અને ‘સરોદ’)

પૂરો થયો પ્રવાસ હવે ઘર તરફ વળો

પૂરો થયો પ્રવાસ હવે ઘર તરફ વળો
કાયમ નથી નિવાસ હવે ઘર તરફ વળો
નીકળ્યા અને પાછા ફર્યા ખોટા સ્થળે સતત
ભૂલા પડેલ શ્વાસ! હવે ઘર તરફ વળો
પાદર, તળાવ, પીપળો ને સાંજનો પ્રહર
વર્ષોથી છે ઉદાસ હવે ઘર તરફ વળો
સંવેદના ઉત્તેજના અચરજ કાં ગુમ થયાં?
પડતી મૂકો તપાસ હવે ઘર તરફ વળો
આ તો નગરનો સૂર્ય છે એ આગ ઓકશે
એમાં નથી પ્રકાશ હવે ઘર તરફ વળો…
– રિષભ મહેતા