🌸 माँ की रसोई और बचपन की खुशबू
कभी-कभी ज़िंदगी बहुत आगे निकल जाती है…
लेकिन दिल वही रुक जाता है — माँ की रसोई में।
आज की यह कहानी नहीं, एक एहसास है। शायद आपको भी अपने बचपन में ले जाए।
👩🍳 माँ की रसोई
जब हम छोटे थे,
रसोई सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं थी।
वो थी —
हमारी शिकायतों की अदालत
हमारे सपनों का कमरा
और प्यार का सबसे बड़ा भंडार
माँ जब आटा गूंथती थी,
तो लगता था जैसे उसमें सिर्फ पानी नहीं,
दुआएँ भी मिला रही हो।
दाल की खुशबू पूरे घर में फैलती थी,
और हम रसोई के दरवाज़े पर खड़े होकर पूछते,
“माँ, खाना कब बनेगा?”
🍲 सादा खाना, गहरी खुशी
ना पिज़्ज़ा था,
ना बर्गर,
ना ऑनलाइन ऑर्डर।
फिर भी:
गरम फूली हुई रोटी
दाल-चावल
आलू की सब्ज़ी
और अंत में गुड़
इनसे ज़्यादा स्वादिष्ट कुछ नहीं था।
क्योंकि उसमें माँ का प्यार मिला होता था।
🌆 बड़े होकर क्या खो दिया?
आज हम बड़े हो गए हैं।
ऑफिस, मीटिंग, बिज़नेस, टारगेट…
सब कुछ है।
लेकिन क्या वो सुकून है?
अब खाना ऐप से आता है,
रसोई मॉडर्न हो गई है,
लेकिन वो “माँ” वाली खुशबू नहीं आती।
💭 एक दिन की बात
कुछ दिन पहले घर गया था।
माँ ने पूछा,
“क्या खाएगा?”
मैंने कहा,
“कुछ भी बना लो।”
माँ मुस्कुराई और बोली,
“बचपन में तो तू हर दिन अलग फरमाइश करता था।”
उस दिन समझ आया —
हम बड़े तो हो गए, पर माँ के लिए अब भी बच्चे ही हैं।
🌼 छोटी सी सीख
अगर आपके माता-पिता आपके साथ हैं,
तो यह आपकी सबसे बड़ी दौलत है।
आज:
उनके साथ बैठकर खाना खाइए
उनकी रसोई की तारीफ़ कीजिए
एक बार “धन्यवाद” कहिए
यकीन मानिए,
उनकी आँखों की चमक किसी भी सफलता से बड़ी होती है।
✨ अंत में
ज़िंदगी में बहुत कुछ मिलेगा —
नाम, पैसा, शोहरत…
लेकिन
माँ की रसोई और बचपन की खुशबू — दोबारा नहीं मिलती।
आज अगर यह पढ़कर आपके चेहरे पर मुस्कान आई हो,
तो एक बार माँ को गले ज़रूर लगाइए।
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